Thursday, 3 September 2015

"धुंधला गयी शक़्ल"



                       
                                     




मन के आंगन में हुई कुछ अजीब हलचल
तेरी आहटों ने छेड़ी है शायद कोई ग़ज़ल

तेरे इन्तजार का शिकवा करें ये अबसार 
बड़े बियावान से हुए गली चौबारे महल 

जिक्र तेरा ख्वाब तेरे है तेरा ही तसब्बुर 
सरगोशियों में लिपटी तनहा रात बेकल 

उस लिखी गयी नज्म में अजाब था इतना 
बहने को ये अश्क खुद खुद गये मचल 

ये माना नसीब पर इख्तियार नहीं अपना 
अब इसकी हर बात पर करते हम अमल 

नादानी पर अपनी बड़ा सकून है "मंजुषा
दुनिया कहती रही हमें थोड़ा कम अकल 

अजीज बड़ा था खुद को निहारते रहना 
आब आइना और धुंधला गयी शक़्ल 


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