Tuesday, 15 October 2013

ये अंधविश्वास कब तक






हमारा देश ऋषि मुनियों की पावन स्थली रहा है पुरातन काल से लेकर लोगों की प्रगाढ़ आस्था देवी देवताओं से लेकर ऋषि मुनियों संत महात्माओं तक रही है परन्तु आज की परिस्थिति  
चिंताजनक है | आज के युग में जन मानस के अन्दर श्रद्धा के नाम पर एक भयंकर अंधविश्वास का माहौल बनता जा रहा है ,हर शहर गली मोहल्ले में आज किसी न किसी बाबा का साधू का बर्चस्व कायम है | ये अवश्य या संभव है कि लोग अपनी आस्था को किसी के प्रति अवश्य प्रकट करें चाहे वो ईश्वर हो या कोई महात्मा हो या फिर कोई साधू संत ,ये सही है कि सत्संग और प्रवचन से हमें मानसिक शांति मिलती है और अध्यात्मिक शांति मिलती है परन्तु आज के युग में ये सब एक पाखंड धोखा और भक्ति के नाम पर चलने वाला कारोबार बनकर रह गया है ,धर्म के नाम पर अपना हित साधने वाले ऐसे साधू बाबाओं की कोई कमी नहीं है जो समाज की कमजोर नब्ज औरतों और बच्चों को विश्वास में लेकर अपने कृत्यों को अंजाम देते हैं | ये किसी एक बाबा के विषय में नहीं है बल्कि ऐसे हजारों उदाहरण हमारे सामने मौजूद है जहाँ कोई न कोई साधू या संत कुकर्म या लोगों को छलता हुआ पकड़ा जाता है | ये बेहद गंभीर विषय है और एक दुखद पहलु है कि जो संत महात्मा अपनी वाणी के ओज से हमारे हृदय को निर्मल कर सकते हैं लोगों की अगाध ज्ञान पिपासा को शांत कर सकते हैं वही बाबा साधू संत पर किसी दुष्कर्म का संगीन आरोप हो | आस्था और अंधविश्वास के माहौल से ऊपर उठ कर लोगों को ये जानना चाहिए और जानने का पूरा हक़ भी है कि आज के बाबा या संत है क्या ,इन साधू संतो की परिभाषा क्या है इनके जीवन यापन करने का क्या ढंग है ये अपने जीवन में सही में संत है या नहीं | जब भी कोई एक इंसान किसी दुसरे इंसान से ऐसी धार्मिक आस्था लगा बैठता है तो दूसरा इंसान एक भगवान की तरह हो जाता है ऐसे में  उसकी जिम्मेवारी कई गुना बढ़ जाती है यहाँ साधू संतों को सही अर्थ में परिभाषित करना बेहद जरूरी है साधू कौन है बाबा क्या है  | 
जब भी कोई इंसान साधू या संत बनता है तो उसका संसार से अपने घर परिवार से  मोह माया से एक नाता टूट जाता है ,वो सारे ऐशोआराम का परित्याग कर एक दुर्लभ जीवन जीने की और मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो जाता है,उसका एक ही लक्ष्य रह जाता है की वो अपना पूरा जीवन सादगी से ईश्वर में लीन होकर बिताये और जनता को ज्ञान, प्रवचन दे और लोगों की अध्यात्मिक ज्ञान पिपासा को शांत करे  | 
सतयुग, त्रेता जैसे युगों में अगर भूले से भी कभी किसी महात्मा साधू के दर्शन हो जाते थे तो लोग धन्य हो उठते थे,इतना तेज उनके चेहरे पर समाहित रहता था | प्राचीन काल में ऋषि मुनियों का वर्चस्व रहा ये ऋषि वो ज्ञानी पंडित थे जिन्होंने संसार का मोह माया का त्याग दिया और ईश्वर की खोज में एक परम सत्य की  खोज में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया,  हिमालय की कंदराओं में बैठ हजारों साल तपस्या की जिनका इस भौतिक संसार से कोई वास्ता नहीं था | हमारे वेद पुराण प्राचीन ग्रन्थ इन्ही ऋषि मुनियों  की देन है आज भी हम उन ग्रंथों को इश्वर का सन्देश मान पूजते हैं हमारे वेदों में इतना दुर्लभ ज्ञान है की विज्ञान भी उसके सामने कुछ नहीं है इन ऋषियों ने अपने तपों से ऐसी अपार शक्तियों को हासिल किया था कि ये अदृश्य हो जाते थे और किसी अन्य जगह दृश्यमान होते थे, पल भर में अन्तर्धान हो जाना कुछ ही क्षणों में ब्रहमांड की दूरी तय करना इतियादी, ये तपस्या कोई साधारण तपस्या नहीं होती थी बल्कि एक ऐसी कठोर तपस्या जो बिना अन्न जल को ग्रहण किये हजारों सालों तक चलती थी तब जाकर ऐसे ज्ञान की या दिव्य शक्ति की प्राप्ति संभव थी  | उस समय के ऋषियों ने कभी भी अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं दिया बल्कि अपने अन्दर छुपे ज्ञान को सदगति देते थे ,यहाँ तक की राजा भी राज्य पर आयी भारी विपदा के समय राज्य सम्बन्धी सलाह लेने के लिए किसी न किसी ऋषि महात्मा का आश्रय लेते थे | 
   वेदों में लिखे साधू संतों के लिए वैधानिक नियमों के अंतर्गत मोह माया से परे जीवन जीना पड़ता है जबकि आज ऐसा नहीं है साधू महात्माओं आज का ये रूप बहुत कुछ सोचने को विवश करता है ,न ही आज का संत एक कठोर जीवन जीने को दृढ हैं बल्कि भक्ति के नाम पर खुद को भगवान बनाने की कोशिश की जाती है , लोगों की श्रद्धा और आस्था को विलासिता के पावं तले कुचला जा रहा है | आज का साधू या बाबा लोगों के बीच राजा की तरह रहता है ,हजारों सेवादार नौकर आगे पीछे घूमते हैं अंगरक्षकों की फ़ौज खड़ी रहती है ,आज के बाबा कितनी जमीनों पर कब्ज़ा जमा करोड़ों की संपत्ति के मालिक बने बैठे हैं ,दर्शनों के लिए लोगों की इतनी भीड़ तो शायद किसी मंदिर में भी देखने को नहीं मिलती है | भक्ति के नाम पर कुकृत्यों और दुष्कर्मों का एक अजीब  मिश्रण पिछले कुछ सालों में देखने को मिला है , कृष्ण प्र्बचन या गीताज्ञान के मध्य न जाने किस अबोध या मासूम पर वो शैतान नजर पर जाये कि अपनी हवस और कामना की आग को बुझाने हेतु एकांत वास का बहाना बना ऐसे घनघोर गंदे कृत्यों पाप दुष्कर्मों को अंजाम दिया जाता है | भक्ति के नाम पर छलावा करने वाली बाबाओं की बेहद डरावनी तसवीर उभर कर आ रही है ,जो स्वयं को ईश्वर बता कर जाने कितने लोगों की श्रद्धा का अपमान कर रहें हैं एक अंधविश्वास का वातावरण तैयार कर रहे हैं |
लोगों में इस प्रकार के अंधविश्वास और आस्था को लेकर जागरूकता बेहद जरूरी है कि वो ये समझे कोई मनुष्य ईश्वर का वो दर्ज प्राप्त नहीं कर सकता जो स्वयं ईश्वर का है  क्यों कि मनुष्य के अन्दर अच्छाई के साथ साथ कितनी बुराइयां और कमजोरियां हैं ,वो भी अन्य जीवों की तरह एक प्राणी है जो जन्म लेता है और समय के काल चक्र से ग्रसित हो मृत्यु को प्राप्त होता है | ईश्वर एक ही है जिसने इस ब्रहमांड का निर्माण किया इस सृष्टि की रचना की प्रकृति जीव जंतुओं और मनुष्य को बनाया , ईश्वर सभी के दिलों में वास करता है उसे अपने अन्दर ढूंढें अपने अच्छे कर्मों में खोजे फिर कहीं अन्यत्र जाने कि आवश्यकता नहीं होगी |  


4 comments:

  1. आवश्यकता है इन तथाकथित साधुओं से दूर रहने की...श्रद्धा उचित है अंध विश्वास नहीं ....

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  2. आस्था मन के अन्दर और ईश्वर के प्रति होनी चाहिए! अपने कर्म पर भरोसा होना चाहिए! कर्म प्रधान विश्व करी राखा....

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  3. बेहद आवश्यक और अनूठा लेख है , आपने जो कुछ इसमें बताया है स्थिति इससे भी अधिक भयावह है , लोग बदनामी के भय से रिपोर्ट नहीं करते बस ....
    यह लोग भरोसे लायक नहीं !!

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  4. आपके ब्लॉग को ब्लॉग - चिठ्ठा में शामिल किया गया है, एक बार अवश्य पधारें। सादर …. आभार।।

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